Tuesday, April 16, 2013

ਲਾਦੇਨ ਵਿਰੁੱਧ ਅਮਰੀਕੀ ਕਾਰਵਾਈ ਦਾ ਭੇਤੀ ਸੀ ਕਿਆਨੀ


                                           ਭੇਤ ਭਰੇ ਪ੍ਰਗਟਾਵੇ

-ਅਲਕਾਇਦਾ ਸਰਗਨਾ ਓਸਾਮਾ ਬਿਨ ਲਾਦੇਨ ਨੂੰ ਕਤਲ ਕਰਨ ਦੀ ਮੁਹਿੰਮ ਬਾਰੇ ਅਮਰੀਕਾ ਨੇ ਪੰਜ ਮਹੀਨੇ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਦੇ ਫੌਜ ਮੁਖੀ ਅਸ਼ਫ਼ਾਕ ਪਰਵੇਜ਼ ਕਿਆਨੀ ਨੂੰ ਦੱਸ ਦਿੱਤਾ ਸੀ। ਇਹ ਦਾਅਵਾ ਵਾਲ ਸਟ੍ਰੀਟ ਜਰਨਲ ਤੇ ਵਾਸ਼ਿੰਗਟਨ ਟਾਈਮਜ਼ ਦੇ ਸਾਬਕ ਰਿਪੋਰਟਰ ਰਿਚ ਮਿਨਟਰ ਨੇ ਆਪਣੀ ਕਿਤਾਬ ਲੀਡੀਂਗ ਫ੍ਰਾਮ ਬਿਹਾਇੰਡ-ਦਿ ਰਿਲੈਕਟੈਂਟ ਪ੍ਰੈਸੀਡੈਂਟ ਐਂਡ ਦਾ ਐਡਵਾਈਜ਼ਰਜ ਹੂ ਡਿਸਾਇਡ ਫਾਰ ਹਿਮ ਵਿਚ ਕੀਤਾ ਹੈ।
ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਿਖਿਆ ਕਿ ਓਸਾਮਾ ਨੂੰ ਲੱਭਣ ਵਿਚ ਆਈਐੱਸਆਈ ਦਾ ਇਕ ਕਰਨਲ ਮਦਦਗਾਰ ਸਾਬਤ ਹੋਇਆ। ਕਰਨਲ 2010 ਵਿਚ ਅਮਰੀਕੀ ਖੁਫੀਆ ਏਜੰਸੀ ਸੀਆਈਏ ਦੇ ਇਸਲਾਮਾਬਾਦ ਸਥਿਤ ਦਫਤਰ ਵਿਚ ਭੇਜਿਆ ਗਿਆ ਸੀ। ਜਦੋਂ ਸੀਆਈਏ ਨੇ ਇਹ ਭੇਤ ਖੋਲ੍ਹਿਆ ਕਿ ਆਈਐਸਆਈ ਦਾ ਇਕ ਕਰਨਲ ਇਸਲਾਬਾਦਾ ਵਿਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਸੰਪਰਕ ਬਣਾ ਕੇ ਓਸਾਮਾ ਬਾਰੇ ਜਾਣਕਾਰੀ ਦੇਣ ਦੀ ਪੇਸ਼ਕਸ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਸ ਉੱਤੇ ਬਹਿਸ ਹੋਈ। 
ਫਿਲਹਾਲ ਸੀਆਈਏ ਨੇ ਲਾਦੇਨ ਦਾ ਟਿਕਾਣਾ ਕਰਨਲ ਦੇ ਦਫਤਰ ਆਉਣ ਤੋ ਇਕ ਮਹੀਨੇ ਦੇ ਅੰਦਰ ਹੀ ਲੱਭ ਲਿਆ। ਲਾਦੇਨ ਨੂੰ ਅਮਰੀਕੀ ਸੀਲ ਕਮਾਂਡੋ ਨੇ ਪਿਛਲੇ ਸਾਲ ਮਈ ਵਿਚ ਉਸ ਦੇ ਘਰ ਵੜ ਕੇ ਮਾਰ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ। ਕਿਤਾਬ ਮੁਤਬਾਕ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਕਿਤੇ ਜ਼ਿਕਰ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ ਕਿ ਲਾਦੇਨ ਨੂੰ ਕਤਲ ਕਰਨ ਦੀ ਮੁਹਿੰਮ ਨੂੰ ਜਿੰਨਾ ਮਾਣ ਓਬਾਮਾ ਟੀਮ ਨੇ ਦਿੱਤਾ ਓਨਾਂ ਹੋਰ ਕਿਸੇ ਨੇ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ। 
ਕਹਾਣੀ ਬਣਾਈ ਗਈ ਸੀ : ਲਾਦੇਨ ਦੇ ਕਤਲ ਮਗਰੋਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕੀ ਆਖਿਆ ਜਾਵੇਗਾ, ਇਸ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਕਹਾਣੀ ਬਣਾ ਲਈ ਗਈ ਸੀ। ਇਕ ਅਮਰੀਕੀ ਅਧਿਕਾਰੀ ਮੁਤਾਬਕ ਲਾਦੇਨ ਨੂੰ ਡਰੋਨ ਹਮਲੇ ਵਿਚ ਮਾਰੇ ਜਾਣ ਦੀ ਗੱਲ ਕਹੇ ਜਾਣ ਮਗਰੋਂ ਉਸ ਦੀ ਲਾਸ਼ ਲੈਣ ਲਈ ਅਮਰੀਕੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਭੇਜਣ ਦੀ ਗੱਲ ਕਹਿਣ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਵ੍ਹਾਈਟ ਹਾਊਸ ਵਿਚ ਵਿਚਾਰ ਵਟਾਂਦਰੇ ਕੀਤੇ ਗਏ। ਮੰਨਿਆ ਜਾ ਰਿਹਾ ਸੀ ਕਿ ਇਸ ਨਾਲ ਅਮਰੀਕੀ ਕਮਾਂਡੋ ਦੇ ਪਾਕਿਸਤਾਨੀ ਧਰਤੀ ਉੱਤੇ ਖਾਤਮੇ ਨੂੰ ਅੰਜਾਮ ਦੇਣ ਨਾਲ ਸਿਆਸੀ ਕਲੇਸ਼ ਘੱਟ ਪਵੇਗਾ। ਅਫਸਰ ਮੁਤਾਬਕ ਲਾਦੇਨ ਨੂੰ ਕਤਲ ਕਰਨ ਦੀ ਮੁਹਿੰਮ ਬਾਰੇ ਅਸ਼ਫਾਕ ਪਰਵੇਜ਼ ਕਿਆਨੀ ਦਸੰਬਰ 2010 ਤੋਂ ਜਾਣਦਾ ਸੀ। ਇਸ ਮੁਹਿੰਮ ਲਈ ਉਹ ਚੁੱਪ ਚੁਪੀਤੀ ਸਹਿਮਤੀ ਦੇ ਚੁੱਕਾ ਸੀ। ਇਸ ਕਹਾਣੀ ਨੂੰ ਸੁਤੰਤਰ ਰੂਪ ਨਾਲ ਪੁਸ਼ਟ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਪਰ ਇਸ ਨੂੰ ਸਮਝਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਲਾਦੇਨ ਦੇ ਮਾਰੇ ਜਾਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਓਬਾਮਾ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਕਿਉਂ ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਨੂ ਫੌਜੀ ਸਹਾਇਤਾ ਬੰਦ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਦਕਿ ਉਸ ਦਾ ਟਰੇਨਿੰਗ ਕੈਂਪਲੈਕਸ ਲਾਦੇਨ ਦੇ ਘਰ ਤੋਂ ਸਿਰਫ 800 ਯਾਰਡ ਦੂਰੀ 'ਤੇ ਸੀ।
: ਕਿਤਾਬ ਮੁਤਾਬਕ ਲਾਦੇਨ ਦੀ ਜਾਇਦਾਦ ਦੀ ਜਾਂਚ ਕਰਨ ਬਾਰੇ ਜਦੋਂ ਸੀਆਈਏ ਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗਿਆ ਕਿ ਐਬਟਾਬਾਦ ਦੀ ਜਿਹੜੀ ਜ਼ਮੀਨ 'ਤੇ ਉਸ ਦਾ ਘਰ ਬਣਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ ਉਹ ਪਾਕਿਸਤਾਨੀ ਫੌਜ ਅਕਾਦਮੀ ਦਾ ਹੀ ਹਿੱਸਾ ਸੀ ਪਰ ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਉਸ ਨੂੰ ਵੱਖ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ। 14 ਮਾਰਚ 2011 ਨੂੰ ਵ੍ਹਾਈਟ ਹਾਊਸ ਦੇ ਸਿਚੁਏਸ਼ਨ ਰੂਮ ਵਿਚ ਬੈਠਕ ਦੌਰਾਨ ਅਮਰੀਕੀ ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਬਰਾਕ ਓਬਾਮਾ ਨੇ ਫੈਸਲਾ ਲਿਆ ਸੀ ਕਿ ਅਮਰੀਕਾ, ਪਾਕਿਸਤਾਨ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਸਕੀਮ ਬਾਰੇ ਭੇਤ ਨਹੀਂ ਦੇਵੇਗਾ। 

कमलेश्वर के उपन्यासों में नारी शिक्षा और स्वातंत्र्य



                                            शोध-पत्र


श्रीमती उर्मिला देवी चौधरीशोधार्थी, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान (भारत) 

कमलेश्वर जी ने अपने उपन्यासों में नारी के विविध रूपों को अभिव्यक्ति  दी है।  वे नारी जीवन के चितेरे ही नहीं उसके पक्षधर भी हैं।  उनके  उपन्यासों की   अधिकतर नारियां शिक्षित हैं जो कि समय-समय पर अपने शिक्षित होने का प्रमाण देती हैं।  'काली आंधी' की मालती, 'तीसरा आदमी' की चित्रा, 'कितने पाकिस्तान' की सलमा, ' सुबह-दोपहर-शाम' की शांता, 'समुद्र में खोया हुआ आदमी' की तारा  'वही बात' की समीरा,  'अनबीता व्यतीत' की समीरा आदि ऐसी स्त्री पात्र हैं जिन्होंने अपने जीवन से सम्बंधित ठोस कदम उठाए हैं।  इन सभी आधुनिक नारियों ने नारी स्वतंत्रता का बिगुल बजाकर नारी जीवन को एक नया और स्वतंत्र  धरातल प्रदान किया है।

'काली आंधी' की मालती एक सुदृढ़ नेता के रूप में हमारे सामने आती है।  मालती के पति जगदीश वर्मा राजनीति में आने के लिए उसका  पूरा सहयोग देते हैं।  उनका मानना है, "देश के निर्माण में औरतों को भी आगे आना चाहिए। औरतें यानी हमारी आधी जनसँख्या जब तक इस तामीर में हमारा हाथ नहीं बंटाएंगी, तब तक हर काम की सपीड आधी रहेगी .....यह बेहद जरूरी है कि हमारे घर की औरतें आगे आएं और हर काम में मर्दों का हाथ बटाएँ...।"१  मालती भी देश की अन्य महिलाओं को  एकजुट  होकर महिला सेवा दल बनाने का सन्देश देती है। ".....आने वाले चुनावों में  हमें बहुत काम करना  है .....मैं चाहूंगी कि कम से कम तीस  महिलाएं आगे आयें और दल का निर्माण करें।"२   चुनावों के दौरान जब विपक्ष के नेता चारों  तरफ मालती की जयजयकार नहीं सुन पाते तो  वे मालती के चुनाव कार्यालय को लूटते हैं और उसके कार्यकर्ताओं को बुरी तरह पीटते हैं। औरत को अबला मानकर उसे दबाने वाले गन्दी मानसिकता वाले उन नेताओं को वह करारा जवाब देती है, "यह समझ कर की मैं औरत हूँ और डर जाऊँगी.....हमारे कार्यालय  को लूटा गया उसमें आग लगाई गई और शांत कार्यकर्ताओं को बुरी तरह पीटा  गया....अब आप बताइए, या तो मैं डरकर चुनाव मैदान से भाग जाती, या ईंट  का जवाब पत्थर से देती ...ये दोनों ही रास्ते बुजदिली के होते।  मैं कायर नहीं हूँ ... बुजदिल नहीं
हूँ।"३ 
तीसरा आदमी उपन्यास की नायिका चित्रा पढ़ी-लिखी नारी है। विवाह के समय नरेश के पिता अपनी बहू चित्रा के सम्बन्ध  में कहते हैं, "नरेश की माँ, चित्रा इतनी पढ़ी-लिखी है, उसका मन तुम्हारे कामों में नहीं लगेगा ।"४  परन्तु नरेश की माँ उसे ऐसी लड़की नहीं मानती और यह बात सही साबित होती है। चित्रा शिक्षित होने के साथ-साथ घर के प्रत्येक कार्य में निपुण होती है। भाषा और साहित्य पर अधिकार होने के कारण वह प्रूफ-रीडिंग का कार्य भी करती है। अपनी आलोचनात्मक दृष्टि के कारण वह लेखकों के द्वारा  नारी के प्रति गलत शब्दावली प्रयोग करने पर व्यंग्य  कस देती है, "कितने गधे हैं तुम्हारे ये लेखक!  इतनी भी तमीज़ नहीं कि क्या लिख रहे हैं!......नारी को समझते वमझते कुछ नहीं, बस दिल की भड़ास  निकालते हैं।"५  नरेश जब चित्रा को दिल्ली में अकेले छोड़ कर चला जाता है तो वह एक विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी करती है और अपने दो बच्चों का पालन पोषण करती है। जब नरेश अपनी भूल का प्रायश्चित करता हुआ उसे लेने के लिए वापिस आता है तो वह उसे इनकार करते हुए अपनी दृढ़ता का परिचय देती है। वह नरेश से कहती है, "तुम इस तरह जा सकते हो, मैं नहीं .....।  हो या न हो पर मैं इतनी बेचारी नहीं हूँ, जितना तुम समझ रहे हो।"६ 
शिक्षित होने के कारण ही आधुनिक नारियों का धर्म  या मज़हब के प्रति रवैया बदल गया है। कितने पाकिस्तान की सलमा धर्म  या मज़हब की आड़ में बनाये गए रिश्तों में विश्वास नहीं रखती ।  वह इंसानियत के रिश्ते को सबसे बड़ा रिश्ता मानती है, "मजहबों के आने  और नाजिल होने से पहले भी तो लोग किसी उसूल के तहत ही अपने समाज को चला रहे थे।" ७  वह स्वयं एक मुसलमान औरत होते हुए बेझिझक हिन्दू व्यक्ति के साथ सम्बन्ध  स्थापित करती है।  इसी उपन्यास के कामरेड इमाम नाज़िश की पत्नी अपने पति की भांति साम्प्रदायिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर विभाजन के समय भारत छोड़ कर पाकिस्तान नहीं जाती।  वह भारत को ही अपना राष्ट्र मानते हुए अपने पति का त्याग कर देती है ।  अदीब की अदालत  में इमाम नाजिश हिंदुस्तान से दूर जाना जिन्दगी का सबसे बड़ा गलत फ़ैसला स्वीकार करता हुआ कहता  है, "अब मेरे पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं है ....शादी को तीन महीने हुए थे,  मैं अपने भरे  पूरे घर और बीवी को अमरोहा में छोड़ कर उस अंधे सैलाब में बहता हुआ पाकिस्तान पहुँच गया ...अपनी सरज़मीं से उखड़कर.....मेरी बीवी टीचर हो गयी और अमरोहा में ही उसने अपनी पूरी ज़िंदगी बच्चों को पढ़ाने में लगा दी .....उसने हिंदुस्तान में एक नई नस्ल पैदा कर दी पर मैंने एक नस्ल बरबाद कर दी।"८ 
'समुद्र में खोया हुआ आदमी'  के पात्र  श्यामलाल के बेरोजगार होने पर उनकी पुत्री तारा चालीस रूपये माहवार पर हरबंस के 'पैटर्न  हाउस' में नौकरी करके अपने परिवार को आर्थिक संकट से बचा लेती है श्यामलाल के पिता को लगने लगता है,  'जैसे  घर को सिर्फ चालीस  रूपये माहवार  की जरूरत  थी....इतने से रूपयों की कमी के कारण पूरा घर रुका -रुका सा लगता था ।'९  तारा घर खर्च चलने के साथ -साथ अपने छोटे भाई-बहिन  की शिक्षा पर भी खर्च करती है ।वह अपनी बहन को नर्सिंग कोर्स के लिए भर्ती  करवाती है।  उसका मानना है "आजकल नर्सों की बहुत मांग  है।  पास करते ही कहीं न कहीं नौकरी चट से मिल जाएगी ।"१०  वह अपने भाई और बहन को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती है।  इतना ही नहीं वह अपने हमउम्र  लड़के हरबंस से प्यार करके बिना दान दहेज़ के विवाह भी कर लेती है।  वह  बेटी के रूप में बोझ नहीं बल्कि शुरू से लेकर अंत तक वह उनका सहारा बनी हुई नजर आती है। 
'वही बात' की उच्च शिक्षित युवती समीरा का विवाह परिवार की सहमति से प्रशांत से कर दिया जाता है परन्तु विवाह के पश्चात् प्रशांत उसे पति का प्यार नहीं दे पाता।   ऐसे में समीरा बहुत अधूरापन  महसूस करती है।  समीरा अपने पति से कहती है "...तुमने कभी सोचा है मैं कहाँ-कहाँ अधूरी होती जा रही हूँ?"११   वह इस रिश्ते को उम्र भर ढ़ोने की बजाय प्रशांत से तलाक लेकर पुनर्विवाह जैसा साहसिक फ़ैसला लेती है जिसे नवीन नारी क्रांति की संज्ञा दी जा सकती है।  
'सुबह -दोपहर -शाम ' उपन्यास की पात्र शांता में शिक्षा के कारण अपने राष्ट्र के प्रति स्वाभिमान की भावना उत्पन्न हुई है। वह अपने ससुराल में सभी ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी निभाती है, परन्तु जब उसे अपने पति प्रवीन के द्वारा अपने क्रान्तिकारी देवर के साथ किए गये धोखे का पता चलता है तो वह उसे धिक्कारती है, "तुमने नवीन के साथ विश्वासघात नहीं किया बल्कि अपने देश के साथ गद्दारी की है ........तुम ग़द्दार हो........ देश के दुश्मन हो .......आज से मेरा तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं।"१२   वह अपने देवर की मदद करने की हर संभव कोशिश करती है।
शरद  ऋतु की शुरूआत होते ही अफगानिस्तान, साइबेरिया, यूरोपीय और अन्य एशियाई देशों में जमी बर्फ़ के कारण अकाल के चलते  बड़ी संख्या में विदेशी मेहमान पक्षी समूह बना कर भोज्य पदार्थ की खोज में भारत आते हैं। ये रंग बिरंगे पक्षी निराली अठखेलियाँ कर भारतवासियों को खूब लुभा कर फरवरी मार्च महीने में बसंत आगमन के करीब अपने गंतव्य पर पुनः लौटते हैं।   ' अनबीता व्यतीत'  की समीरा इन पक्षियों से बहुत प्रेम करती है। चोट लगने पर वह उन्हें मरहम लगाती है परन्तु विवाह के पश्चात् जब वह अपने पति कुंवर जय सिंह द्वारा खोला गया चर्मशोधक कारखाना देखती है, जिसमें  इन रंग-बिरंगे मासूम  पक्षियों को मारकर उनके शरीर में कैमिकल युक्त भूसा भरकर उनकी प्रदर्शनी लगाई जाती है तो उसे अपने पति की इस करतूत से आघात पहुँचता है वह इस कार्य के प्रति  घृणा व्यक्त  करती है, "देखिये, मैं आपकी पत्नी जरूर हूँ लेकिन मैं एक औरत भी हूँ .....मेरा शरीर संतप्त  होता रहे और मेरा मन मृत होता रहे, यह मुझे आपके साथ बहुत दूर तक नहीं ले जा सकता ....मेरे लिए यह मुमकिन होगा कि मैं मुद्रों की इस दुनिया  से बाहर चली जाऊं ।"१३   कुंवर जय सिंह समीरा को दुनिया की दुहाई देते हैं तो वह कहती है,  "दुनिया क्या कहेगी?  मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं .....अगर आप चाहते हैं कि मैं यहीं रहूँ ...ज़िंदगी भर आपके पास और साथ रहूँ तो वह टेनरी का धंधा बंद करना पड़ेगा आपको ।"१४  जय सिंह के द्वारा ऐसा न करने पर समीरा सबक़ सिखाने के लिए उसका त्याग कर देती है ।  
निष्कर्षतः कमलेश्वर जी ने अपने उपन्यासों के माध्यम से नारी शिक्षा और स्वातंत्र्य सम्बन्धी अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए नारी मुक्ति की पहल की है।
सन्दर्भ सूची -
१  काली आंधी, कमलेश्वर, पृ. सँ.-५
२  काली आंधी, कमलेश्वर, पृ. सँ-११
३  काली आंधी, कमलेश्वर, पृ. सँ-८७
४  तीसरा आदमी,  (समग्र उपन्यास )  कमलेश्वर,  पृ. सँ-१६२
५  तीसरा आदमी, (समग्र उपन्यास ), कमलेश्वर,  पृ. सँ-१७६
६ तीसरा आदमी, (समग्र उपन्यास ) कमलेश्वर,  पृ. सँ-२०६
७ कितने पाकिस्तान, कमलेश्वर, पृ. सँ-१२२ 
८  कितने पाकिस्तान, कमलेश्वर, पृ. सँ-९४
९  समुद्र में खोया हुआ आदमी, कमलेश्वर, पृ. सँ- ११
१० समुद्र में खोया हुआ आदमी, कमलेश्वर, पृ. सँ-९६
११ वही बात, कमलेश्वर, पृ. सँ -४०
१२ सुबह दोपहर शाम, कमलेश्वर, पृ. सँ-१३०
१३ अनबीता व्यतीत, कमलेश्वर, पृ. सँ-११०
१४ अनबीता व्यतीत, कमलेश्वर, पृ. सँ-१११

ਸ੍ਰੀਲੰਕਾ ਵਿਚ ਮਰਨਗੇ ਅਵਾਰਾ ਕੁੱਤੇ ਪਰ ਸੋਚੋ ਸਾਨੂੰ ਕੌਣ ਬਚਾਏਗਾ!




-ਇੰਟਨੈੱਟ ਉੱਤੇ ਨਵੀਂਆਂ ਨਵੀਂਆਂ ਖ਼ਬਰਾਂ ਲੱਭਦੇ-ਲੱਭਦੇ ਮੈਂ ਇਕ ਖ਼ਬਰ ਲੱਭੀ ਹੈ ਕਿ ਸ੍ਰੀਲੰਕਾ ਵਿਚ ਹੁਣ ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤੇ ਮਾਰ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣਗੇ ਕਿਉਂਕਿ ਓਸ ਮੁਲਕ ਨੇ ਕਈ ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ ਆਪਣੀ ਜਾਨ ਉੱਤੇ ਖੇਡ ਕੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਕੁੱਤਿਆਂ ਦੀ ਦਹਿਸ਼ਤ ਆਪਣੇ ਪਿੰਡੇ ਉੱਤੇ ਝੱਲੀ ਹੈ। ਪਤਾ ਇਹ ਵੀ ਲੱਗਾ ਹੈ ਕਿ ਓਥੇ ਕੁੱਤਿਆਂ ਦੇ ਗੰਭੀਰ ਮੁੱਦੇ ਉੱਤੇ ਲੋਕ ਇੰਨੇ ਕੁ ਤੰਗ ਤੇ ਦਹਿਸ਼ਤਜ਼ਦਾ ਸਨ ਕਿ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਗੁੱਸੇ ਨੂੰ ਵੇਖਦੇ ਹੋਏ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਵਲੋਂ ਕੀਤਾ ਫੈਸਲਾ ਬਦਲਣਾ ਪਿਆ। ਹਕੀਕਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਮੈਂ ਖੁਦ ਨਹੀਂ ਸੀ ਜਾਣਦਾ ਕਿ ਇੰਡੀਆ ਵਾਂਗ ਸ੍ਰੀਲੰਕਾ ਵਿਚ ਵੀ ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤੇ ਵੱਧ ਚੁੱਕੇ ਹਨ। ਓਥੇ ਵੀ ਕੁੱਤਿਆਂ ਤੇ ਰੈਬੀਜ਼ ਦੇ ਮਾਮਲਿਆਂ ਵਿਚ ਸਥਿਤੀ, ਭਾਰਤ ਵਰਗੀ ਹੀ ਹੈ। ਜਿਵੇਂ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਪਸ਼ੂ ਪੰਛੀ ਪ੍ਰੇਮੀਆਂ ਨੇ ਕੁੱਤੇ ਮਾਰਨ ਤੇ ਮਰਾਉਣ ਉੱਤੇ ਰੋਕ ਲੁਆ ਦਿੱਤੀ ਹੈ, ਮੈਂ ਸੋਚਦਾਂ ਓਥੇ ਸ੍ਰੀਲੰਕਾ ਵਿਚ ਵੀ ਕਿਸੇ ਜ਼ਿੱਦੀ ਗਰੁੱਪ ਨੇ ਇਹ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਆਪਣੇ ਨਾਂ ਕਰਾ ਲਈ ਹੋਵੇਗੀ। ਖ਼ੈਰ ਹੁਣ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤਿਆਂ ਤੋਂ ਛੁਟਕਾਰਾ ਮਿਲਣ ਵਾਲਾ ਹੈ... ਪਰ ਮੈਂ ਸ੍ਰੀਲੰਕਾ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰ ਰਿਹਾਂ, ਭਾਰਤ ਦੀ ਨਹੀਂ।
ਏਥੇ ਵੇਖਦਾਂ ਹਾਂ ਕਿ (ਭਾਰਤ ਵਿਚ) ਹਰੇਕ ਪਾਸੇ ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤੇ ਹਰਲ ਹਰਲ ਕਰਦੇ ਫਿਰਦੇ ਹਨ। ਰਾਤ ਨੂੰ ਕਦੇ ਬਾਈਕ ਉੱਤੇ ਕਿਸੇ ਸੜਕ ਤੋਂ ਲੰਘਣਾ ਪਵੇ ਤਾਂ ਵੇਖੀਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਕ ਕੁੱਤਾ ਦੌੜਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਏਧਰ ਓਧਰ ਭੱਜੇ ਫਿਰਦੇ ਕੁੱਤੇ ਬਾਈਕ ਵਾਲੇ ਨਾਲ ਦੌੜਾਂ ਲਾਉਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦੇ ਹਨ। ਜਦੋਂ ਇੰਨੇ ਕੁੱਤੇ ਵੇਖ ਕੇ ਘਬਰਾਹਟ ਹੋਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਹਾਦਸਾ ਵਾਪਰਣ ਦਾ ਡਰ ਲੱਗਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਪੂਰੇ ਮੁਲਕ ਦੀ ਗੱਲ ਨਾ ਵੀ ਕਰੀਏ ਤਾਂ ਪੰਜਾਬ ਵਿਚ ਕੁੱਤਿਆਂ ਦੀ ਵੱਧਦੀ ਗਿਣਤੀ ਦਾ ਖ਼ਤਰਾ ਲਗਾਤਾਰ ਬਰਕਰਾਰ ਹੈ। 
ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਸਿਆਸਤ ਦੇ ਕ੍ਰਿਕਟ ਦਾ ਬੁਖ਼ਾਰ ਸਿਖ਼ਰਾਂ 'ਤੇ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਕ੍ਰਿਕਟ ਦਾ ਤਾਂ ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤੇ ਵਧਣ ਵਿਚ ਕੋਈ ਰੋਲ ਨਹੀਂ ਪਰ ਸਿਆਸਤ ਦਾ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ। ... ਕਿਉਂਕਿ ਸਾਡੇ ਆਗੂ ਜਦੋਂ ਜੋਤਸ਼ੀਆਂ ਤੋਂ ਮਹੂਰਤ ਕਢਾਉਣ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਉਹ ਕਹਿ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਜੀਅ-ਹੱਤਿਆ ਨਹੀਂ ਕਰਨੀ...। ਆਗੂ ਜਦੋਂ ਜਿੱਤਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਉਹ ਖੁਦ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਜੀਅ-ਹੱਤਿਆ ਤੋਂ ਬਚਿਆ ਜਾਵੇ। ਕਾਹਨੂੰ ਮੰਦਾ ਕਰਮ ਕਰੀਏ! ਵੱਡੇ ਵੱਡੇ ਅਫਸਰ, ਜੋਤਸ਼ੀਆਂ ਤੇ ਪੱਤਰੀ ਵਾਚਣ ਵਾਲਿਆਂ ਦੇ ਮੁਰੀਦ ਹਨ। ਦਿਲੋਂ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦਾ ਕਿ ਜੀਅ-ਹੱਤਿਆ ਹੋਵੇ। ਕੁੱਤਿਆਂ ਦੀ ਮੌਤ ਕੁਦਰਤੀ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਕੋਈ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ/ਕਹਿੰਦਾ ਪਰ ਜੇ ਮਰਾਉਣ ਦੀ ਗੱਲ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਜੀਵ-ਹੱਤਿਆ ਦਾ ਖਿਆਲ ਮਨ ਕਮਜ਼ੋਰ ਕਰਨ ਲੱਗ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਮੈਂ ਨਹੀਂ ਕਹਿੰਦਾ ਸਗੋਂ ਵੱਖ ਵੱਖ ਲੋਕਾਂ ਤੇ ਰਾਜਸੀ ਵਰਕਰਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਗੱਲਬਾਤ ਦਾ ਨਚੋੜ ਹੈ। 
ਮੈਂ ਸਮਝਦਾਂ ਹਾਂ ਕਿ ਕੁੱਤਿਆਂ ਦੀ ਸਮੱਸਿਆ ਇੰਨੀ ਛੋਟੀ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਅਸੀਂ ਮਜ਼ਾਕ ਮਜ਼ਾਕ ਵਿਚ ਲੈ ਕੇ ਧਿਆਨ ਹੀ ਨਾ ਦਈਏ। ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤੇ ਸਾਡੇ ਆਲੇ ਦੁਆਲੇ ਹਰੇਕ ਵੇਲੇ ਘੁੰਮਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ। ਕਈ ਥਾਂਈਂ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਸਕੂਲ ਜਾਣ ਸਮੇਂ ਕੁੱਤਿਆਂ ਨੇ ਫੜ ਕੇ ਪਾੜ ਸੁੱਟਿਆ। ਓਦੋਂ ਕੋਈ ਹਿਤੈਸ਼ੀ ਨਹੀਂ ਕਹਿੰਦਾ ਕਿ ਕੁੱਤਿਆਂ ਨੇ ਜੀਵ-ਹੱਤਿਆ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਹੈ, ਹੁਣ ਕੁੱਤਿਆਂ ਦੀ ਹੱਤਿਆ-ਮੁਹਿੰਮ ਚਲਾ ਦਈਏ। ਕੁਝ ਲੋਕ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਜ਼ਹਿਰਲੀ ਰੋਟੀ, ਜ਼ਹਿਰ ਗੁੱਝੇ ਪੇੜੇ ਜਾਂ ਹੋਰ ਜ਼ਹਿਰੀ ਚੀਜ਼ ਪਾ ਕੇ ਅਸੀਂ ਕੁੱਤੇ ਮਾਰ ਸਕਦੇ ਹਾਂ। ਬੇਸ਼ੱਕ ਇਵੇਂ ਇਕ-ਦੋ ਜਾਂ ਕੁਝ ਕੁੱਤੇ ਮਾਰੇ ਜਾ ਸਕਦੇ ਹਨ। ਪਰ ਬੇਜ਼ੁਬਾਨ ਕੁੱਤਿਆਂ ਨੂੰ ਜਾਨੋਂ ਮਾਰਨ ਦਾ ਇਹ ਕੋਈ ਵਧੀਆ ਢੰਗ ਨਹੀਂ।


ਅੱਜ ਤੋਂ 15-16 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਨਗਰ ਕੌਂਸਲਾਂ ਤੇ ਨਗਰ ਨਿਗਮਾਂ ਵਾਲੇ ਬੜੇ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਇਕ ਮਿੰਟ ਵਿਚ ਕੁੱਤੇ ਮਾਰ ਦਿੰਦੇ ਸਨ। ਓਹੀ ਤਰੀਕਾ ਅੱਜ ਵੀ ਕਾਰਗਰ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਕੁੱਤੇ ਬੇਸ਼ੱਕ ਖੂੰਖਾਰ ਹਨ ਤੇ ਲਾਗ ਵਾਲੀਆਂ ਗੰਦੀਆਂ ਬਿਮਾਰੀਆਂ ਤੋਂ ਪੀੜਤ ਹਨ ਪਰ ਬੇ-ਅਕਲ ਤੇ ਬੇ-ਜ਼ੁਬਾਨ ਹੋਣ ਕਰ ਕੇ ਉਹ ਇਹ ਵੀ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦੇ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਰ ਕੇ ਕਿੰਨੀ ਦਹਿਸ਼ਤ ਪੱਸਰੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਬੜੇ ਦੁੱਖ ਵਾਲੀ ਗੱਲ ਹੈ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਵਿਧਾਨ ਸਭਾ ਚੋਣਾਂ ਵਿਚ ਵੀ ਕਿਸੇ ਸੁਚੇਤ ਰਾਜਸੀ ਧਿਰ ਨੇ ਕੁੱਤਿਆਂ ਦਾ ਮੁੱਦਾ ਨਹੀਂ ਉਭਾਰਿਆ। ਹਾਲਾਂਕਿ ਚਾਹੀਦਾ ਤਾਂ ਇਹ ਸੀ ਕਿ ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤੇ ਮਰਵਾਉਣ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਟਿਕਾਣੇ ਬੰਨ੍ਹਣ ਦੇ ਮਸਲੇ ਨੂੰ ਮੈਨੀਫੈਸਟੋ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ। ਕਿਸੇ ਨੇ ਇਹ ਮੁੱਦਾ ਗੌਲਣ ਲਾਇਕ ਨ੍ਹੀਂ ਸਮਝਿਆ। ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਲੋਕ ਜ਼ਿਆਦਾ ਸਿਆਣੇ ਹੋਣਗੇ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਨਤਾ ਦੀ ਇੰਨੀ ਨਿੱਕੀ ਮੁਸੀਬਤ, ਮੁਸੀਬਤ ਲੱਗਦੀ ਹੀ ਨ੍ਹੀਂ ਹੋਣੀ। ਪਰ ਇਹ ਮੁਸੀਬਤ ਨਿੱਕੀ ਮੋਟੀ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਜਿਹੜੀ ਖ਼ਬਰ ਹਿੰਦੀ ਬੋਲੀ ਵਿਚ ਆਈ ਹੈ, ਉਹਦੀ ਨਿੱਕੀ ਜਿਹੀ ਕਾਤਰ ਲੇਖ ਵਿਚ ਨਜ਼ਰ ਆ ਰਹੀ ਹੈ। 
ਜਦੋਂ ਕੋਈ ਖੂੰਖਾਰ ਸੜਕਛਾਪ ਅਵਾਰਾ ਕੁੱਤਾ ਕਿਸੇ ਆਮ ਬੰਦੇ ਨੂੰ ਚੱਕ ਵੱਢਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਰੈਬੀਜ਼ ਹੋਣ ਦਾ ਖ਼ਤਰਾ ਪੈਦਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਸਿਵਲ ਹਸਪਤਾਲਾਂ ਵਿਚ ਜਾਓ ਤਾਂ ਓਥੇ ਕੋਈ ਮੁਲਾਜ਼ਮ ਢੰਗ ਨਾਲ ਗੱਲ ਨ੍ਹੀਂ ਕਰਦਾ। ਦਬਕੇ ਵਾਲਾ ਸਿਆਸੀ ਆਗੂ ਜਾਂ ਹੋਰ ਰਸੂਖ ਵਾਲੇ ਬੰਦੇ ਤਾਂ ਦਵਾਈ ਅੰਦਰੋਂ ਕਢਵਾ ਲੈਂਦੇ ਹਨ ਪਰ ਆਮ ਬੰਦਾ ਨਿਰਾਸ਼ ਹੋ ਕੇ ਰਹਿ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਪ੍ਰਾਈਵੇਟ ਡਾਕਟਰਾਂ ਕੋਲ ਕਈ ਵਾਰ ਢੁਕਵੀਂ ਦਵਾਈ ਨ੍ਹੀਂ ਹੁੰਦੀ। ਇਹ ਬਹੁਤ ਵੱਡੀ ਸਮੱਸਿਆ ਹੈ। 
ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤੇ ਫੜਣ ਦੇ ਨਾਂ 'ਤੇ ਚੱਲਦੀ ਫੜ ਲਓ-ਫੜ ਲਓ ਮੁਹਿੰਮ ਵੀ 'ਅਸਰ' ਨਹੀਂ ਦਿਖਾ ਰਹੀ। ਏਧਰੋਂ ਕੱਤੇ ਫੜ ਕੇ ਸਾਡੇ ਨਿਗਮੀ ਮੁਲਾਜ਼ਮ, ਥੋੜ੍ਹੀ ਦੂਰ ਛੱਡ ਆਉਂਦੇ ਹਨ ਤੇ ਉਹ ਕੁੱਤੇ ਪੈੜ ਸੁੰਘ ਸੁੰਘ ਕੇ ਵਾਪਸ ਮਨਪਸੰਦ ਜਗ੍ਹਾ ਉੱਤੇ ਪਹੁੰਚ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਹੈ ਕੁੱਤੇ ਫੜਣ ਵਾਲੀ ਮੁਹਿੰਮ ਦਾ ਅੱਖੀ ਵੇਖਿਆ ਹਾਲ। 'ਹੱਲ' ਇਕੋ ਇਕ ਹੈ ਤੇ ਓਹ ਹੈ ਕਿ ਅਵਾਰਾ, ਗੰਦੇ ਤੇ ਭਿਆਨਕ ਕੁੱਤੇ ਮਾਰਨ ਨੂੰ ਆਪਾਂ ਜੀਅ-ਹੱਤਿਆ ਵਿਚ ਨਾ ਗਿਣੀਏ। ਸਗੋਂ ਇਹ ਸੋਚੀਏ ਕਿ ਅਵਾਰਾ ਤੇ ਖੂੰਖਾਰ ਕੁੱਤੇ ਜੇ ਮਰਣਗੇ ਤਾਂ ਜੀਵਾਂ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਤਮ ਨਸਲ 'ਮਨੁੱਖ' ਬਚ ਜਾਣਗੇ। ਮਨੁੱਖਾਂ ਦੇ ਨਿੱਕੇ ਨਿੱਕੇ ਬੱਚੇ ਗਲੀਆਂ ਵਿਚ ਖੇਡਣ ਤੋਂ ਔਖੇ ਹਨ। ਜਵਾਨ, ਅੱਧਖੜ ਤੇ ਬਜ਼ੁਰਗ ਓਥੋਂ ਲੰਘਣ ਲੱਗੇ ਤ੍ਰਬਕਦੇ ਹਨ, ਜਿੱਥੇ ਚਾਰ ਕੁੱਤੇ ਬੈਠੇ ਹੋਣ। ਅੱਜ ਤਾਂ ਕੁੱਤਿਆਂ ਦੇ ਝੁੰਡਾਂ ਦੇ ਝੁੰਡ ਫਿਰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਬਿਨਾਂ ਉਲਾਰ ਹੋ ਕੇ ਇਹ ਕਿਹਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਕਿ 92 ਫ਼ੀਸਦੀ ਕੁੱਤੇ ਗੰਦੇ, ਖੂੰਖਾਰ ਤੇ ਭਿਆਨਕ ਬਿਮਾਰੀਆਂ ਤੋਂ ਪੀੜਤ ਹਨ। ਭੁੱਖੇ, ਗੰਦੇ ਕੁੱਤੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਪੱਖ ਤੋਂ ਬਚਣੇ ਨਹੀਂ ਚਾਹੀਦੇ। ਜਾਂ ਤਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੁੰ ਫੜ ਕੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਇਲਾਜ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ ਜਾਂ ਕੋਈ ਹੱਲ ਕੱਢਿਆ ਜਾਵੇ, ਹੁਣ ਵਾਲੀ ਸਥਿਤੀ ਤਾਂ ਇਨਸਾਨਾਂ ਲਈ ਖ਼ਤਰਾ ਹੈ। 
ਸੋਚਣ ਵਾਲੀ ਗੱਲ :  ਸ੍ਰੀਲੰਕਾ ਦੀ ਜਨਤਾ ਦੀ ਤਾਂ ਸੁਣੀ ਗਈ ਤਾਂ ਪਰ ਸਾਡੀ ਕੌਣ ਸੁਣੇਗਾ? ਸੱਚ ਹੈ ਕਿ ਜਿਹੜੇ ਤਾਕਤਵਰ ਲੋਕ ਕੁੱਤਿਆਂ ਦੇ ਖ਼ਾਤਮੇ ਨੂੰ ਜੀਅ ਹੱਤਿਆ ਮੰਨਦੇ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਤਾਂ ਆਸ ਨਹੀਂ! ਦੇਖਦੇ ਆਂ ਕੀ ਬਣਦਾ!
-ਯਾਦਵਿੰਦਰ 
94653 29617